" मैं "
कभी ये सोंचता हूँ
की कौन हूँ " मैं "
खुद से पूछता हूँ
की क्या हूँ " मैं "
ये जिस्म
या रूह हूँ
"मैं "
सबसे पूछता हूँ
की कौन हूँ
"मैं "
किसी का बेटा
किसी का भतीजा
किसी का भांजा
किसी का भाई
किसी का देवर
किसी का नवासा
इन रिश्तों मैं उलझा
खुद से पूछता हूँ
किसका कितना हूँ
" मैं "
जितना सोचता हूँ
उलझ जाता हूँ
" मैं "
वक्त का खिलौना
या ख्वाब का पिटारा ,
एक कठपुतली
या सांस लेता एक ढांचा
अस्थियौं की ईमारत
या खून का बोतल ,
नसों की गांठ
या सांसों की चिमनी ,
या कुछ नहीं हूँ
" मैं "
फिर सोंचता हूँ
हमें क्यों गुमान होता है ?
किस बात का
गुमान होता है ?
इस शरीर का ?
जो इस मिटटी का है ,
या इस धरती का " क़र्ज़ "
जो एक दिन चुकाना होगा !
या इन सांसों का ?
जो है हवाओं का " क़र्ज़ "
फिर सोंचता हूँ
किससे पूछूं ? कहाँ खोजूं ?
ये ताकाश पूरी होगी की नहीं
ये सवाल पूरा होगा की नहीं
फिर
" मैं "
खामोश हो जाता हूँ
ढूंढ़ता हूँ
अपने ही अन्दर
अपने आपको
और
" मैं "
खो जाता हूँ .
--- अमित शंकर .
Sunday, August 1, 2010
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